सत्य-छीर का पान
सब इंद्रियों का भ्रमजाल, यह जगत एक फ़रेब,
उलझा इस मिथ्या प्रपंच में, तू बेखबर और गुमनाम।
निश्चित है अवसान, आज नहीं तो कल ,
क्यों मुख मोड़ रहा है तू, यह शाश्वत एक विधान।
प्रज्ञा के प्रखर ज्योति का अपनी , तू कर शीघ्र आह्वान,
देख परे इस दृश्य-जगत से, कर अनंत सत्य-क्षीर का पान।
काव्य-संग्रह
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