Saturday, September 19, 2026

सत्य-छीर का पान

सब इंद्रियों का भ्रमजाल, यह जगत एक फ़रेब,

उलझा इस मिथ्या प्रपंच में, तू बेखबर और गुमनाम।

निश्चित है अवसान, आज नहीं तो कल , 

क्यों मुख मोड़ रहा है तू, यह शाश्वत एक विधान। 

प्रज्ञा के प्रखर ज्योति का अपनी , तू कर शीघ्र आह्वान,

देख परे इस दृश्य-जगत से, कर अनंत सत्य-क्षीर का पान।


काव्य-संग्रह 

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