मन को आनंद और तन को अमरता,
इस द्विउद्देश्य में एक संतुलित समता चाहिए।
मस्तिष्क को इस काया की जिजीविषा और भरण,
इससे परे मन को बस एकांत चाहिए।
कहे विकास, इस द्वन्द से पार उतरने को,
तटस्थ चित्त और समभाव चाहिए।
posted by Vikas Srivastava at 11:51 AM
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