मन को आनंद और तन को अमरता,
इस द्विउद्देश्य में एक संतुलित समता चाहिए।
मस्तिष्क को इस काया की जिजीविषा और भरण,
इससे परे मन को बस एकांत चाहिए।
कहे विकास, इस द्वन्द से पार उतरने को,
तटस्थ चित्त और समभाव चाहिए।
मन को आनंद और तन को अमरता,
इस द्विउद्देश्य में एक संतुलित समता चाहिए।
मस्तिष्क को इस काया की जिजीविषा और भरण,
इससे परे मन को बस एकांत चाहिए।
कहे विकास, इस द्वन्द से पार उतरने को,
तटस्थ चित्त और समभाव चाहिए।
मनुष्य का दुख शायद ही कभी स्वयं वास्तविकता से उत्पन्न होता है; बल्कि, इसकी उत्पत्ति वास्तविकता और अपेक्षा के बीच के घर्षण (टकराव) से होती है। मानसिक कष्ट के मूल में आसक्ति निहित है—किसी विशिष्ट, वांछित परिणाम से मन का एक कठोर जुड़ाव। जब कोई व्यक्ति किसी कार्य की शुरुआत अपने आत्म-सम्मान, पहचान या भावनात्मक मान्यता को एक पूर्व-निर्धारित परिणाम से जुनूनी रूप से बांधकर करता है, तो वह एक अत्यंत नाजुक आंतरिक संरचना का निर्माण कर लेता है। जिस पल वास्तविकता इस खाके से भटकती है, एक गहरा मानसिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। यह विसंगति दैनिक व्यावहारिक वास्तविकताओं से और बढ़ जाती है: व्यक्ति अक्सर खुद को उन कार्यों में संलग्न पाते हैं जिनसे वे नफरत करते हैं, अपने भीतर कार्य करने या बोलने की तीव्र इच्छा रखते हैं, फिर भी सामाजिक, व्यावसायिक या व्यक्तिगत दायित्वों के कारण अपनी प्रामाणिक भावनात्मक भावनाओं को दबाने के लिए मजबूर होते हैं।
भावात्मक दमन का यह बाध्यकारी कृत्य और उस परिणाम को पाने के लिए अप्रिय कार्य करने की हताशा, जो पहुँच से बाहर रहता है, मन को एक युद्धक्षेत्र में बदल देता है। मस्तिष्क प्रतिरोध के एक अनंत चक्र में फंस जाता है— वर्तमान क्षण का विरोध करना, अनिवार्य कार्यों का विरोध करना, और घटनाओं के वास्तविक, निष्पक्ष परिणाम का विरोध करना। इस निरंतर प्रतिरोध का तात्कालिक दुष्परिणाम तनाव, चिंता और अंततः दुख है। इसलिए, अप्रसन्नता परिस्थितियों द्वारा थोपी गई कोई बाहरी स्थिति नहीं है; यह उन चरों पर नियंत्रण छोड़ने से इनकार करने के कारण उत्पन्न आंतरिक घर्षण का चरम बिंदु है जो स्वाभाविक रूप से अनियंत्रित हैं।
हालाँकि, इस गतिशीलता का रचनात्मक विश्लेषण करने के लिए, हमें स्वस्थ उद्देश्य और विनाशकारी आसक्ति के बीच अंतर करना होगा। लक्ष्य-निर्धारण और दिशात्मक प्रयास मानव प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं; प्रयास स्वयं दुख का स्रोत नहीं है। विकृति तब शुरू होती है जब कार्य परिणाम पर मनोवैज्ञानिक निर्भरता में बदल जाता है। जब कोई कार्य केवल एक विशिष्ट पुरस्कार प्राप्त करने के लिए लेन-देन के रूप में किया जाता है, तो व्यक्ति अपनी आंतरिक स्थिति को बाहरी कारकों के हवाले कर देता है। यदि परिणाम हासिल नहीं होता है - या यदि इस प्रक्रिया में अरुचिकर कार्यों से गुजरना पड़ता है - तो मन निवेश के नुकसान को महसूस करता है, जिससे भावनात्मक दमन और नाराजगी उत्पन्न होती है। यह चक्र इसलिए चलता रहता है क्योंकि मूल धारणा का परीक्षण नहीं हो पाता: यह धारणा कि खुशी भविष्य में है, जो किसी विशिष्ट परिणाम पर सशर्त है।
इस निरंतर चक्र का सबसे व्यावहारिक समाधान समभाव का विकास है—अनुभव से विचलित न होने वाली मानसिक स्थिरता और शांति की स्थिति। मौलिक स्वीकृति में निहित, समभाव निष्क्रिय त्याग या भाग्यवादी उदासीनता नहीं है। इसके बजाय, यह बाहरी परिणामों से आंतरिक शांति का विचारपूर्वक विसंयोजन है। जब कोई व्यक्ति अंतिम परिणाम से पूर्ण अनासक्ति बनाए रखते हुए प्रक्रिया में पूर्ण जुड़ाव के साथ कार्य करता है, तो आंतरिक घर्षण गायब हो जाता है। वर्तमान कार्य - चाहे वह आनंददायक हो या उबाऊ, पूर्ण उपस्थिति के साथ किया जाना चाहिए, जबकि परिणाम को केवल कई संभावित तथ्य बिंदुओं में से एक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए
"क्या होना चाहिए था" से लड़ने के बजाय "जो है" को स्वीकार करने से, भावनाओं का दमन अनावश्यक हो जाता है। भावनाओं को जबरन दबाने या आवेगपूर्वक व्यक्त करने की आवश्यकता के बिना स्वीकार किया जाना ही समता का अविचल आधार रहता है। जब परिणामों को तटस्थ स्पष्टता के साथ स्वीकार किया जाता है, तो विफलता स्वयं को नीचा दिखाने की अपनी शक्ति खो देती है, और सफलता अहंकार पैदा करने की अपनी क्षमता खो देती है। अनासक्ति हमारे प्रयास को खुशी के लिए एक हताश सौदेबाजी के साधन के बजाय स्वयं में एक साध्य में बदल देती है। समभाव मानसिक संघर्ष को उसकी जड़ से बेअसर कर देता है, जिससे खुशी बाहरी जीत के लिए एक क्षणिक पुरस्कार नहीं, बल्कि अस्तित्व की एक निरंतर, आत्मनिर्भर स्थिति बन जाती है
The diagram models the continuous feedback loop between conscious action, character formation, and psychological conditioning - mapping how human behavior oscillates between external engagement and internal transformation. At its core, the model presents human decision-making not only as isolated events, but as a dynamic, cyclical system divided by temporal awareness and by the dual domains of existence i.e. the Realm of KARMA (external action/environment) and the Realm of VIRTUE (internal character/psyche).
1. The Anatomy of the Dual Realms
The model bisects human
experience along a central axis, separating temporal progression (Future vs.
Past) and experiential domains:
Realm of
KARMA (Upper Sphere): This domain represents the tangible
world of external stimuli, environmental interactions, and observable actions.
"Karma" here is used in its classical sense—action and its direct
consequence.
Realm of
VIRTUE (Lower Sphere): This domain encapsulates the
internal, subconscious architecture of an individual. It houses acquired
conditioning, disposition, moral virtues, and entrenched habits.
2. The Four Stages of the Behavioral Loop
The cyclical arrows
illustrate a continuous clockwise progression through four distinct operational
phases:
Phase I: Decision Making ("Right or Wrong")
This stage defines how we
respond to environmental stimuli. Based on existing virtues and acquired
habits, an individual decides whether to act on moral principles (Right/Wrong) or momentary preferences (Like/Dislike). This evaluation initiates an Action in the external environment.
As actions unfold in the
upper hemisphere ("Realm of KARMA"), they move past the present
moment into the recorded Past. The model notes
a critical psychological friction: we often know what is objectively
"right", yet dislike performing it due to entrenched preferences.
However, deliberate repetition of correct actions—despite initial
aversion—triggers neuroplasticity ("Our brain does the rest"), turning
effortful moral choices into seamless subconscious patterns.
Crossing into the Realm of VIRTUE, external actions retroactively mold
internal character. The model highlights that past actions, combined with how
the psyche absorbs environmental feedback, directly dictate an individual's
moral virtues and psychological resilience.
Finally, virtues solidify
into automated Habits. These internalized habits
dictate an individual's future baseline of likes, dislikes, and instinctual
reactions, effectively setting the stage for the next decision cycle when fresh
environmental stimuli arrive.
3. Core Insights and Practical Implications
The central thesis of the model is that morality and habit formation operate on a feedback loop. Character is not a static trait, but an emergent property of repeated actions over time.
|
Dimension |
Primary Focus |
Key Takeaway |
|
Cognitive
Friction |
Overcoming
Aversion |
Knowing
the right action is insufficient; active execution despite personal dislike
is necessary for long-term health and sustainability. |
|
Neuroplastic
Adaptation |
"Our
Brain Does the Rest" |
Conscious,
disciplined choices in the present eventually automate into effortless
subconscious virtues over time. |
|
Systemic
Continuity |
A
cyclical paradigm |
Every
present action (Karma) rewires internal disposition (Virtue), which
deterministically shapes all future decisions. |
Ultimately, this is a systemic model for self-mastery. It asserts that while human beings cannot directly rewrite their deep-seated habits instantaneously, they can control their immediate actions. By repeatedly choosing moral correctness over momentary preference in the Realm of KARMA, one systematically re-engineers the Realm of VIRTUE from the inside out.
विचारों की श्रृंखला आज ऐसे ही चल पड़ी कि ५२ साल की उम्र में भी मैं इस जीवन का अभीष्ट समझने में क्यों अपने आप को असमर्थ पाता हूँ। इतने सालों में बहुत कुछ हुआ; बचपन बीता, जवानी के दिन बीते, गृहस्थ जीवन जी रहा हूँ और इसके बाद के दिन भी अब सामने दिख रहे है कि एक दिन इन तमाम जिम्मेदारियों से दूर होकर और सभी तथाकथित अपनों को छोड़कर इस संसार से चले जाना है। किसलिए इस धरती पर आया था, और जीवन में जो किया या हुआ उन सब झंझावातों का क्या मतलब है? मानव उत्पत्ति के कारणों को देखें तो वहां दो विचार उभर कर आते हैं।पहला है कि मानव एक विकास श्रंखला की उत्पत्ति है और उसके गुणसूत्र पिछले लाखों सालों में धीरे-धीरे संशोधित होते हुए आज के मानव में परिणित हुए हैं, जो आगे जाकर और भी परिस्कृत गुणसूत्र के साथ इस धरती पर विचरण करेंगे। आज के वैज्ञानिक युग में ज्ञानिओं में यही विचार मान्य है। इस विचार में कहीं भी मनुष्य जीवन के अभीष्ट, कर्त्तव्य और अधिकार की बात नहीं आती है। यहाँ यह समझना भी जरूरी है की पशु और जानवर भी इसी प्रक्रिया के तहत बने हैं। परन्तु पशु और जानवर किसी भी औपचारिक सामाजिक व्यवस्था से नहीं बंधे हैं और स्वच्छंद होते हुए अपने स्वाभाविक प्रकृति प्रदत्त ज्ञान से चालित होते हैं। दूसरे विचार से इस ब्रह्मंड की रचना एक ईश्वरीय देन है और हर प्राणी का एक अभीष्ट और कर्त्तव्य है जहाँ उसे अपने ज्ञान और कर्मों के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करना या उससे एकाकार होना प्रतिबिंबित होता है।
अगर हम पहले विचार का आलिंगन करें तो जीवन में किसी भी मानव निर्मित व्यावहारिकता या सामाजिक व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है। जीवन में प्रकृति प्रदत्त इच्छाओं की पूर्ति, शारीरिक और मानसिक सुरक्षा और अस्तित्व या जीवन को बनाये रखने के लिए जो भी जरूरी हो उसे निर्बाध रूप से करते रहना ही हमारा कर्त्तव्य और प्राकृतिक मांग है। इस दृष्टि से मनुष्य के मस्तिष्क बोध से उपजी हर वह क्रिया क्षम्य है जो वह करना चाहता है। इसके लिए वह कोई भी प्रणाली या विधि अपना सकता है। यहाँ पर अपनी इच्छा पूर्ति के लिए अरण्य शैली में वह 'जो जीता वही सिकंदर' के अर्थ को अपने जीवन में उतार सकता है और उसे कोई गलत नहीं कह सकता।
चूँकि हम शुरुआती दौर में आरण्यक ही रहे है और धीरे-धीरे आज के मनुष्य रूप को पाए हैं, हमने उल्लिखित अरण्य शैली को व्यवस्थित करते हुए अपने लिए ही एक व्यवस्था को जन्म दिया, जो समय के साथ परिष्कृत होता रहा है, जिसको हमनें सभ्यता और संस्कृति के नाम से जाना। इस व्यवस्था में दुर्व्यवस्था होने की प्रायिकता नगण्य नहीं थी, जिसकी वजह से समय-समय पर कुछ क्रांतिकारी विचारकों ने अपना योगदान दिया और व्यवस्था को और सुदृढ़ किया। लेकिन मनुष्य के प्राकृतिक मनोवृत्ति (भविष्यवाचन, भय, उत्कंठा, कुंठा, शक्ति, संचय तथा आसक्ति इत्यादि) ने इस व्यवस्था तंत्र के संचालकों तथा तंत्र से संचालितों के बीच एक गहरी खाई तैयार की जिसने शोषण और भयादोहन को जन्म दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि संसार में दो ही तरह के मनुष्य जी रहे हैं, शोषक और शोषित। अगर इतिहास उठा कर देखें तो उपर्युक्त प्राकृतिक मनोवृत्ति, जो अनवरत काल से बदली नहीं है, ने इस दुनिया में अनेकों लड़ाईयाँ करवाईं, गुलाम संस्कृति का सदियों तक परिष्करण किया, उपनिवेश की प्रथा चरितार्थ किया और आज भी आज की सुसंस्कृत समाज में यह सब चल रहा है, भले ही इन सबका तरीका बदल गया है। इसी से प्रेरित होकर इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि भले ही हम बैलगाड़ी से हवाई जेट का सफर कर चुके हैं लेकिन मानव प्रकृति अपने कारगुजारियों से बाज नहीं आती और दुनिया हमेशा ऐसे ही रहेगी, अर्थात अरण्य व्यावहारिक प्रकृति तब तक चलती रहेगी जब तक इस पर डर का लगाम न लगे। इस डर के आभाव में यह तंत्र या व्यवस्था अवहनीय हो जाती है और समय के साथ ध्वस्त हो जायेगी।
अब हम दूसरे विचार पर ग़ौर करें तो ईश्वर प्रदत्त अभीष्ट और कर्त्तव्य का सामना करना पड़ता है। तमाम धार्मिक ग्रंथों ने अलग-अलग कर्तव्यों के निर्वहन की वक़ालत की है जो अभीष्ट, ईश्वर प्रप्ति, को पाने में मददग़ार होते हैं। परन्तु हमनें ऊपर देखा की स्वच्छंद मनुष्य मनोवृत्ति तो हमें कहीं और ही ले जाती है। इसका मतलब हुआ कि इन ग्रंथों में हमें इस मनोवृत्ति से ही पार पाने की हिदायत दी गयी है। जबकि इस वृत्ति से पार पाते ही हम दुनिया और समाज के कई क्रियायों से विमुख हो जायेंगे, अर्थात हम सिर्फ अपने वजूद के लिए जीने की लालसा से विमुख हो जायेंगे, जो कि एक प्रकृति प्रदत्त वृत्ति है अपने जीवन को संरक्षित करने के लिए। लेकिन सृष्टि तो निरंतर है और इसकी निरंतरता को बनाये रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, जिससे कि भविष्य में जन्मी हमारी पीढ़ी समान परिदृश्य में जीवनयापन कर सके।
इस जिम्मेदारी को पूरा करने में सनातन प्रथा (सार्वभौमिक अध्यात्म, नीति और कर्त्तव्य ) एक महत्वपूर्ण नींव प्रदान करती है। जिसमें व्यक्ति, पंथ, देश और काल किसी को भी विशेष दर्जा प्राप्त नहीं है। यह सिर्फ और सिर्फ प्रकृति विशेष को ध्यान में रखते हुए हमें हमारे कर्तव्यों और कर्मों को दिशा देता है। इसलिए सद्भावना से प्रेरित कर्म ही इस जगत का उद्धार कर सकता है।
पप्पू उस समय में अपने माता-पिता और एक बहन के साथ बनारस के एक बहुत ही पुराने मोहल्ले में रहता था जो कि आज भी अपनी गलियों के लिए प्रायः जाना जाता है। घर का सबसे छोटा लड़का था पर जिम्मेदारियाँ तो बड़ी थीं। कहने को तो उसके कई बड़े भाई-बहन थे पर वह सभी लोग अपने जीवन-यापन के लिए और शहरों का रुख कर लिए थे जिससे की परिवार की बाकी जरूरतें पूरी हो सकें। महज १३ साल का ही तो था पप्पू जब उसके पिता ने उसके सामने ही बनारस के एक नामी अस्पताल में रात को दो बजे के वक़्त दम तोड़ा था। उस रात मां का रुदन और असहज परिस्थिति ने जैसे उस नन्हें बच्चे की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। वह ही तो था जो १० साल की उम्र से हर महीने अपने बूढ़े पिता को लेकर बनारस की कोषागार (ट्रेज़री) में जाता था और सभी कागज़ी कार्यवाही करवाते हुए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से २७६ रुपये की पेंशन लेकर ख़ुशी-ख़ुशी घर आता था। इस प्रक्रिया में कोषागार के सभी लिपिक, कर्मचारी और यहाँ तक की कोषाध्यक्ष भी इस बच्चे को अच्छे से पहचानते थे और बात भी करते थे।
यह कहानी उसी पप्पू की है जो अपनी छोटी उम्र की वजह से सभी पर विश्वास करता था। यह भी कह सकते हैं कि ज़माने के धक्कों ने अभी तक उसके अस्तित्व में नकारात्मकता शब्द का उद्घोष नहीं करवा पाये थे। यहीं से सिलसिला शुरू हुआ, जब उसने अपने पिता को खो दिया और अब उनके पेंशन का थोड़ा अंश उसकी मां के नाम हस्तांतरित होना था। पिता की मृत्यु के एक महीने बाद, जब घर से सभी लोग जा चुके थे, पप्पू कोषागार कार्यालय में एक प्रार्थना पत्र और मृत्यु प्रमाण पत्र लेकर पहुँचा। सम्बंधित लिपिक महाशय ने बहुत ही अच्छे तरीके से उससे बात की और खेद जाहिर करते हुए सहानुभूति भी जताया। तत्पश्चात आगे की कार्यवाही के लिए एक हफ्ते बाद फिर बुलाया। हालाँकि पप्पू उस समय दसवीं कक्षा में प्रवेश किया था फिर भी घर के हालात के मद्देनजर उसे विद्यालय की परवाह किये बिना कचहरी के चक्कर काटने पड़े। इस बार लिपिक महाशय छुट्टी पर थे और दूसरा कोई इस बारे में कुछ बोल नहीं पाया। ऐसे करते करते करीब डेढ़ महीने बाद पप्पू को बताया गया कि गांव के लेखपाल से एक प्रमाण पत्र चाहिए की उसके पिता के परिवार में उनके कितने लड़के-लड़कियां हैं और उन सभी लोगों से यह भी लिखवाना है की पिता की मृत्यु के बाद उनकी विधवा के लिए जो पेंशन बनेगी उसमें से किसी को कोई हिस्सा नहीं चाहिए।
लेखपाल उस समय तहसील में बैठते थे और चूँकि उनको गांव भ्रमण भी करना होता था उनसे मिलना अपने आप में एक दुरूह कार्य हुआ करता था। खैर, कई बार भोजूबीर के तहसील में जाने के बाद उनसे मुलाक़ात हुई और पहले ही बार में पप्पू को पांच रुपये चाय पानी के लिए खर्च करना पड़ा, पर उसे बिश्वास था की यह पैसा जाया नहीं जायेगा। लेकिन उस फ़ोन-और-मोबाइल-विहीन काल में किसी सरकारी महकमे में एक कर्मचारी से मिलना इतना आसान नहीं था। बस, आप चक्कर काटते रहिए और मिलन की तारीख़ प्रभु की इच्छा पर छोड़ दीजिये। इसी सिद्धांत के तहत, पप्पू हफ्ते में २-३ दिन साईकिल से कभी तहसील, कभी कोषागार, कभी लेखपाल के घर के चक्कर काटता रहा। समय-समय पर उस छोटे बच्चे से भी लोगों ने रिश्वत की मांग की जिसे उसने बहुत ही शिद्दत से अंजाम दिया। भले ही घर में माँ के पास पैसे नहीं थे लेकिन अपने पप्पू पर इतना बिश्वास था कि यह ज़रूर एक दिन पेंशन बनवा देगा और इसी वजह से थोड़ा ही सही पर इन मांगों को पूरा करती गयीं। ख़ैर, लेखपाल साहब से अंततः ७ महीने के बाद प्रमाण पत्र मिला। चूँकि अधिकतर भाई-बहन शहर से दूर रहते थे, सभी लोगों से डाक द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र मंगाया गया। वह भी अलग-अलग नहीं चलेगा, एक ही पेज पर सबका हस्ताक्षर चाहिए। इसलिए वह कागज़ देश के कई शहरों से होता हुआ बनारस पहुंचा था जिसमे करीब ४ महीने का समय लगा। अब भी काम पूरा नहीं हुआ, इस अनापत्ति पत्र को एक राजपत्रित अधिकारी से फिर से प्रमाणित करवाना था। अब एक गरीब और लाचार परिवार के लिए यह भी एक पहाड़ सा काम था। किसी ने सुझाया कि उनके परिचय के एक वकील साहब चुंगी कचहरी के किसी अधिकारी से यह काम करवा देंगे। पप्पू बहुत खुश हुआ और उनके साथ जाकर वकील साहब को हस्ताक्षरित कागज़ दे आया, इस आशा के साथ की बस काम हो गया। लेकिन लगभग ३ महीने दौड़ने के बाद वकील साहब ने बताया की आपका कागज़ तो चुंगी कचहरी में अधिकारी साहब के कार्यालय से गायब हो गया। इस गैरज़िम्मेदाराना वाक़ये ने पप्पू को फिर से वहीँ ला खड़ा किया। घर की माली हालत और फिर से हस्ताक्षर के लिए ४ महीने और, किसी ने सुझाया की सभी तो राज़ी थे तो क्यों ना हम सब मिलकर अलग -अलग हस्ताक्षर कर दें। वकील साहब ने वादा किया कि इस बार वह प्रमाणित करवा देंगे लेकिन ३०० रूपये लगेंगे और उन्होंने इसके एवज़ में बख़ूबी जिम्मेदारी निभाई। अब सब प्रमाण पत्र लेकर पप्पू ने कोषागार कार्यालय में जमा कर दिए। समय बीतता गया और वही आज नहीं कल आना लगा रहा। लगभग एक साल से ज्यादा हो गए पर अभी तक पेंशन दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी।
उसी समय एक परिचित ने कहा की उनका परिचय कोषागार कार्यालय में हैं उन्होंने कहा है कि काम हो जायेगा। उस दिन पप्पू माँ और उस परिचित के साथ कार्यालय पहुंचा और आश्चर्यचकित होकर देखा की कैसे सभी कर्मचारी उसके काम को इतनी तत्परता से अंजाम दे रहे हैं। उसके अंदर का विश्वास और दृढ़ हो गया की सब लोग उसके बारे में सोच रहे हैं और उसकी तकलीफ को समझते हैं। उस हफ्ते सब काम हो गया और अंततः पप्पू की माँ का पेंशन उनके हाथ में आ गया। लेकिन यह क्या माँ का पेंशन ३२६ रुपये (महंगाई भत्ता लेते हुए) है तो पिछले इतने महीने के हिसाब से तो ज्यादा होना चाहिए, पप्पू ने परिचित से यह सवाल पूछा। परिचित ने कहा, ''अरे पप्पू , तुम क्या समझ रहे थे की वह लोग ऐसे ही इतनी तत्परता से काम कर रहे थे? असल में जितना पैसा मिला था उसका बीस प्रतिशत उन्हें देना पड़ा और यही बात वे तुमसे नहीं कह पा रहे थे।" पप्पू ने इस बात को समझा और जब माँ के साथ हर महीने कोषागार जाने लगा तो उसे पता चला कि उसके परिचित सच बोल रहे थे।
यह कहानी करीब ४० साल पुरानी है, पप्पू की माँ इस दुनिया में नहीं रहीं पर वह जिन्दा है। लेकिन यह लगभग डेढ़ साल का समय उसके जेहन में आज भी किसी शूल की तरह चुभता है, जब उसके अबोध मन और मस्तिष्क को सरकारी तंत्र ने इस तरह छला था। वह ऐसे कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों को हमेशा शक की निगाह से देखता है और उन्हें मानवता का गुनहगार समझता है। जो गरीब, लाचार, अबोध बच्चे को भी अपनी निर्दयी इच्छाओं की पूर्ति के लिए नहीं छोड़ते।
वह सोचता है कि आज देश में न जाने कितने ही उसके जैसे पप्पू उल्लिखित कहानी से एकाकार हो रहे होंगे और अपने मन में इस समाज, देश और दुनिया के प्रति एक अलग विचार बना रहे होंगे। इन सभी पप्पुओं की यह विचारमला कहीं न कहीं एक अविश्वासी और द्वेषपूर्ण वयस्क तैयार कर रही होगी। हालांकि, खुद पप्पू ने आत्म विश्लेषण करके और अपने को इस विचारमला से ऊपर उठाकर एक ऐसे व्यक्तिव को तैयार किया है जिसका एक मात्रा प्रयोजन है कि उसकी कहानी किसी और के साथ नहीं दुहरायी जाए।
It was in October 2015, I was traveling from Bremen to Karlsruhe via Hanover. Though I bought a first class ticket assuming that it would give me an opportunity to use internet during the travel, somehow, I could not get access to the same. Although there were three occupants in the compartment, the journey seemed to be quite monotonous. All the three occupants were silent and even not seeing the faces. Yes, I was odd man out due to the skin colour as well as the language (I can manage with Deutsch in Germany but not enough). Anyways, as usual with my nature I could not restrain myself from starting a conversation with an old lady who was traveling to Frankfurt. This conversation was very thought-provoking as we discussed the cultural differences as well as philosophical bent of the two countries i.e. India and Deutschland.
As the lady got down in Frankfurt, the ambience in the compartment again became monotonous. But this did not stop me going back again to my natural instinct of starting a conversation with strangers. This time he was none other than a prolific musician who enjoyed paying keyboards in various concerts, orchestra and opera houses in Berlin. He was originally from Giessen in Sued Deutschland but used to live in Berlin. His parents still lived in Giessen.
After some introductory exchanges of words and ideas regarding the profession, hometown and interests, we started esoteric conversation related to the effect of music on wellbeing of human as well as trees, plants and animals, the effect of various frequencies on the mind and body. How does music affect our emotions and is there a universally accepted music stream that is liked by all human being irrespective of their cultural and childhood experiences? Such questions came up because these unsatisfied queries have remained in my psyche for a very long time i.e. since my 20s. I just wanted to share his views on these questions, for which I write this piece.
He placed his opinion as follows: “Our brain attunes itself with our experiences and the musical tones, pitches and other compositions, varying from land to land and making our mind and preparing us to relate to those in our later stages of life. Therefore, relating ourselves with a given type of music composition fully depends on our cultural background, and we can be emotionally activated by the tunes that we are grown up with".
Interesting and remarkable view that
led me to further my studies in this aspect of the musical effects.