विचारों की श्रृंखला आज ऐसे ही चल पड़ी कि ५२ साल की उम्र में भी मैं इस जीवन का अभीष्ट समझने में क्यों अपने आप को असमर्थ पाता हूँ। इतने सालों में बहुत कुछ हुआ; बचपन बीता, जवानी के दिन बीते, गृहस्थ जीवन जी रहा हूँ और इसके बाद के दिन भी अब सामने दिख रहे है कि एक दिन इन तमाम जिम्मेदारियों से दूर होकर और सभी तथाकथित अपनों को छोड़कर इस संसार से चले जाना है। किसलिए इस धरती पर आया था, और जीवन में जो किया या हुआ उन सब झंझावातों का क्या मतलब है? मानव उत्पत्ति के कारणों को देखें तो वहां दो विचार उभर कर आते हैं।पहला है कि मानव एक विकास श्रंखला की उत्पत्ति है और उसके गुणसूत्र पिछले लाखों सालों में धीरे-धीरे संशोधित होते हुए आज के मानव में परिणित हुए हैं, जो आगे जाकर और भी परिस्कृत गुणसूत्र के साथ इस धरती पर विचरण करेंगे। आज के वैज्ञानिक युग में ज्ञानिओं में यही विचार मान्य है। इस विचार में कहीं भी मनुष्य जीवन के अभीष्ट, कर्त्तव्य और अधिकार की बात नहीं आती है। यहाँ यह समझना भी जरूरी है की पशु और जानवर भी इसी प्रक्रिया के तहत बने हैं। परन्तु पशु और जानवर किसी भी औपचारिक सामाजिक व्यवस्था से नहीं बंधे हैं और स्वच्छंद होते हुए अपने स्वाभाविक प्रकृति प्रदत्त ज्ञान से चालित होते हैं। दूसरे विचार से इस ब्रह्मंड की रचना एक ईश्वरीय देन है और हर प्राणी का एक अभीष्ट और कर्त्तव्य है जहाँ उसे अपने ज्ञान और कर्मों के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करना या उससे एकाकार होना प्रतिबिंबित होता है।
अगर हम पहले विचार का आलिंगन करें तो जीवन में किसी भी मानव निर्मित व्यावहारिकता या सामाजिक व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है। जीवन में प्रकृति प्रदत्त इच्छाओं की पूर्ति, शारीरिक और मानसिक सुरक्षा और अस्तित्व या जीवन को बनाये रखने के लिए जो भी जरूरी हो उसे निर्बाध रूप से करते रहना ही हमारा कर्त्तव्य और प्राकृतिक मांग है। इस दृष्टि से मनुष्य के मस्तिष्क बोध से उपजी हर वह क्रिया क्षम्य है जो वह करना चाहता है। इसके लिए वह कोई भी प्रणाली या विधि अपना सकता है। यहाँ पर अपनी इच्छा पूर्ति के लिए अरण्य शैली में वह 'जो जीता वही सिकंदर' के अर्थ को अपने जीवन में उतार सकता है और उसे कोई गलत नहीं कह सकता।
चूँकि हम शुरुआती दौर में आरण्यक ही रहे है और धीरे-धीरे आज के मनुष्य रूप को पाए हैं, हमने उल्लिखित अरण्य शैली को व्यवस्थित करते हुए अपने लिए ही एक व्यवस्था को जन्म दिया, जो समय के साथ परिष्कृत होता रहा है, जिसको हमनें सभ्यता और संस्कृति के नाम से जाना। इस व्यवस्था में दुर्व्यवस्था होने की प्रायिकता नगण्य नहीं थी, जिसकी वजह से समय-समय पर कुछ क्रांतिकारी विचारकों ने अपना योगदान दिया और व्यवस्था को और सुदृढ़ किया। लेकिन मनुष्य के प्राकृतिक मनोवृत्ति (भविष्यवाचन, भय, उत्कंठा, कुंठा, शक्ति, संचय तथा आसक्ति इत्यादि) ने इस व्यवस्था तंत्र के संचालकों तथा तंत्र से संचालितों के बीच एक गहरी खाई तैयार की जिसने शोषण और भयादोहन को जन्म दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि संसार में दो ही तरह के मनुष्य जी रहे हैं, शोषक और शोषित। अगर इतिहास उठा कर देखें तो उपर्युक्त प्राकृतिक मनोवृत्ति, जो अनवरत काल से बदली नहीं है, ने इस दुनिया में अनेकों लड़ाईयाँ करवाईं, गुलाम संस्कृति का सदियों तक परिष्करण किया, उपनिवेश की प्रथा चरितार्थ किया और आज भी आज की सुसंस्कृत समाज में यह सब चल रहा है, भले ही इन सबका तरीका बदल गया है। इसी से प्रेरित होकर इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि भले ही हम बैलगाड़ी से हवाई जेट का सफर कर चुके हैं लेकिन मानव प्रकृति अपने कारगुजारियों से बाज नहीं आती और दुनिया हमेशा ऐसे ही रहेगी, अर्थात अरण्य व्यावहारिक प्रकृति तब तक चलती रहेगी जब तक इस पर डर का लगाम न लगे। इस डर के आभाव में यह तंत्र या व्यवस्था अवहनीय हो जाती है और समय के साथ ध्वस्त हो जायेगी।
अब हम दूसरे विचार पर ग़ौर करें तो ईश्वर प्रदत्त अभीष्ट और कर्त्तव्य का सामना करना पड़ता है। तमाम धार्मिक ग्रंथों ने अलग-अलग कर्तव्यों के निर्वहन की वक़ालत की है जो अभीष्ट, ईश्वर प्रप्ति, को पाने में मददग़ार होते हैं। परन्तु हमनें ऊपर देखा की स्वच्छंद मनुष्य मनोवृत्ति तो हमें कहीं और ही ले जाती है। इसका मतलब हुआ कि इन ग्रंथों में हमें इस मनोवृत्ति से ही पार पाने की हिदायत दी गयी है। जबकि इस वृत्ति से पार पाते ही हम दुनिया और समाज के कई क्रियायों से विमुख हो जायेंगे, अर्थात हम सिर्फ अपने वजूद के लिए जीने की लालसा से विमुख हो जायेंगे, जो कि एक प्रकृति प्रदत्त वृत्ति है अपने जीवन को संरक्षित करने के लिए। लेकिन सृष्टि तो निरंतर है और इसकी निरंतरता को बनाये रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, जिससे कि भविष्य में जन्मी हमारी पीढ़ी समान परिदृश्य में जीवनयापन कर सके।
इस जिम्मेदारी को पूरा करने में सनातन प्रथा (सार्वभौमिक अध्यात्म, नीति और कर्त्तव्य ) एक महत्वपूर्ण नींव प्रदान करती है। जिसमें व्यक्ति, पंथ, देश और काल किसी को भी विशेष दर्जा प्राप्त नहीं है। यह सिर्फ और सिर्फ प्रकृति विशेष को ध्यान में रखते हुए हमें हमारे कर्तव्यों और कर्मों को दिशा देता है। इसलिए सद्भावना से प्रेरित कर्म ही इस जगत का उद्धार कर सकता है।
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